वियोग का प्राकृतिक सौन्दर्य
गरज बरस घनघोर घटा
पुलकित हृदय उद्वेलित धरा
आज प्रलय की घड़ी है
ये आँधी सामने खड़ी है
अभी द्वंद्ध की राणभेरिया
बज उठी है
अभी जवानी शेष पड़ी है
आज प्रलय की घड़ी है
दादुर तेरी करुण पुकार
विरह व्यथा को करती साकार
हे ऋतु वसंत ऋतुराज
ये घनघोर घटा आज
करती चपला सा प्रहार
आज प्रलय की घड़ी है
-अनुज डिमरी
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